राजस्थान के रेगिस्तान में अकाल से बचाव की 100 साल पुरानी परंपरा फिर चर्चा में, जानें क्या हैं ‘कलार और ढूंगरे’

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सिरोही/बाड़मेर 
 पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर और जैसलमेर के सीमांत क्षेत्रों में गोवंश के सामने चारे और पानी का गंभीर संकट देखने को मिल रहा है। कई स्थानों पर पशुपालकों के लिए अपने पशुधन (चारा) का पालन-पोषण करना चुनौती बनता जा रहा है। इन परिस्थितियों के बीच रेगिस्तानी इलाकों में अकाल से निपटने की एक पुरानी पारंपरिक व्यवस्था फिर चर्चा में है। स्थानीय लोग इसे 'कलार और ढूंगरे' के नाम से जानते हैं।

अकाल से मुकाबले के लिए पहले से करते थे चारे का इंतजाम
स्थानीय निवासियों के अनुसार, पश्चिमी राजस्थान में पहले वर्षा की अनिश्चितता और बार-बार पड़ने वाले अकाल को देखते हुए ग्रामीण पहले से ही तैयारियां करके रखते थे। खेती के बाद बचने वाले चारे और अन्य उपयोगी सामग्री को पारंपरिक तरीकों से सुरक्षित रखा जाता था, ताकि वर्षा नहीं होने की स्थिति में पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था बनी रहे। बुजुर्गों का कहना है कि यह 'कलार और ढूंगरे' की व्यवस्था लगभग 100 साल पुरानी परंपरा का हिस्सा है, जिसके जरिए हमारे पूर्वज चारे को लंबे समय तक सुरक्षित रखते थे।

रेगिस्तानी क्षेत्रों में कलार और ढूंगरे जैसी संरचनाएं इसी पारंपरिक व्यवस्था का हिस्सा रही हैं। इनके जरिए पशुचारे को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता था।

जानिए क्या है 'कलार और ढूंगरे' वाली परपंरा
बाड़मेर के स्थानीय निवासी दिलीप डूडी ने बताया कि पुराने समय में ग्रामीण अकाल की आशंका को देखते हुए चारे और पानी के संरक्षण पर विशेष ध्यान देते थे। कलार और ढूंगरे जैसी पारंपरिक व्यवस्थाएं पशुधन को संकट के समय बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।

उनके अनुसार, लोग सामान्य वर्षा वाले वर्षों में ही भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर चारे का भंडारण कर लेते थे। इससे लगातार एक-दो वर्षों तक वर्षा की कमी होने पर भी पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिलती थी। हालांकि, बदलती जीवनशैली और कृषि-पशुपालन के तौर-तरीकों के कारण ऐसी पारंपरिक व्यवस्थाओं का उपयोग अब पहले की तुलना में कम दिखाई देता है।

दो-तीन साल के अकाल से निपटने की रखते थे तैयारी
बाड़मेर के स्थानीय निवासी नारायण चौधरी ने बताया कि पहले के समय में ग्रामीण अकाल को जीवन की एक संभावित चुनौती मानकर चलते थे। पश्चिमी राजस्थान में कई बार पर्याप्त वर्षा नहीं होने के कारण लगातार सूखे जैसी परिस्थितियां बन जाती थीं।

हमारे पूर्वज अकाल को लेकर हमेशा मानसिक रूप से तैयार रहते थे। उन्हें पता था कि किसी वर्ष बारिश नहीं होने पर पशुओं और परिवार के सामने संकट खड़ा हो सकता है। इसलिए कलार और ढूंगरे जैसी पारंपरिक व्यवस्थाओं के जरिए पहले से चारे का संग्रह किया जाता था। इससे दो-तीन साल तक अकाल जैसी परिस्थितियों का सामना करने में मदद मिलती थी।

नारायण चौधरी, स्थानीय निवासी
चौधरी के अनुसार, इस व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ यह था कि संकट के समय पशुधन के लिए चारे की उपलब्धता बनी रहती थी और परिवारों को भी अपनी आजीविका चलाने में सहारा मिलता था।

बदलते दौर में पीछे छूट गई पारंपरिक व्यवस्था
स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले ग्रामीण समाज में पशुधन को परिवार की आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार माना जाता था। इसलिए खेती के साथ-साथ पशुओं के लिए चारे का संग्रह करना भी आवश्यक समझा जाता था। समय के साथ खेती के तरीके, पशुपालन की व्यवस्थाएं और ग्रामीण जीवनशैली बदलने से चारे के पारंपरिक भंडारण की कई विधियां पीछे छूटती चली गईं। हालांकि, इन व्यवस्थाओं की वास्तविक भंडारण क्षमता और कितने वर्षों तक चारा सुरक्षित रह सकता था, इसका वैज्ञानिक आकलन भी आवश्यक है।

क्या पुराने तरीकों से मिल सकता है वर्तमान संकट का समाधान?
बाड़मेर और जैसलमेर के सीमांत इलाकों में गोवंश के सामने उत्पन्न चारे-पानी के संकट ने एक बार फिर पारंपरिक अकाल प्रबंधन की उपयोगिता पर सवाल खड़ा किया है।

विशेषज्ञों के अध्ययन और स्थानीय अनुभवों के आधार पर यह समझा जा सकता है कि कलार और ढूंगरे जैसी पुरानी व्यवस्थाओं को आधुनिक चारा संरक्षण तकनीकों के साथ किस प्रकार उपयोगी बनाया जा सकता है।

इसके साथ ही वर्षा जल संचयन, चारागाह विकास और सामुदायिक चारा भंडारण जैसी व्यवस्थाएं भी सूखे के दौरान पशुपालकों को राहत देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस रेगिस्तान में हमारे पूर्वज सीमित संसाधनों के बावजूद अकाल से मुकाबले की तैयारी रखते थे, क्या आज उस पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक व्यवस्थाओं से जोड़कर गोवंश और पशुपालकों को राहत पहुंचाने का रास्ता निकाला जा सकता है?

 

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