टीम इंडिया में चोटों का कहर, 32 खिलाड़ियों को कराना पड़ा रिहैब; BCCI की रिपोर्ट में बड़े खुलासे

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नई दिल्ली
भारतीय क्रिकेट में खिलाड़ियों की इंजरी अब बड़ी चुनौती बनती जा रही हैं. लगातार चोटिल हो रहे खिलाड़ियों के कारण टीम मैनेजमेंट को अहम सीरीज के दौरानमुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. इस बीच भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (BCCI) के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CoE) की सालाना रिपोर्ट में कई अहम खुलासे हुए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच भारतीय मेन्स टीम के 32 शीर्ष खिलाड़ियों को चोटों से उबरने के लिए रिहैबिलिटेशन से गुजरना पड़ा. इनमें 20 सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट वाले और 12 इंडिया-ए या टारगेटेड कैटेगरी के खिलाड़ी शामिल हैं.

TOI की रिपोर्ट के अनुसार, आईपीएल (इंडियन प्रीमियर लीग) 2026 के बाद भी चोटों का सिलसिला जारी रहा और लगभग हर सीरीज में कम से कम दो खिलाड़ियों के चोटिल होने की स्थिति सामने आई. भारतीय की टेस्ट-वनडे टीम के कप्तान शुभमन गिल और मुख्य कोच गौतम गंभीर भी पिछले एक साल में खिलाड़ियों की फिटनेस संबंधी समस्याओं पर चिंता जता चुके हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि खिलाड़ियों को चोटों से बचाने और उनकी रिकवरी बेहतर करने के लिए मौजूदा व्यवस्था में क्या बदलाव किए जाने चाहिए.

चोटों के बढ़ते मामलों के बीच बीसीसीआई ने सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के लिए खर्च बढ़ाने का प्रावधान किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सीओई का अनुमानित बजट 127 करोड़ रुपये रखा गया है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में वास्तविक खर्च करीब 92 करोड़ रुपये था. यानी बजट में लगभग 35 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है. इस खर्च में प्रशासनिक लागत, प्रशिक्षण पाठ्यक्रम और मैचों से जुड़े व्यय शामिल हैं. हालांकि, बढ़े हुए बजट का असर खिलाड़ियों की फिटनेस और चोटों की रोकथाम पर कितना पड़ता है, यह आने वाले समय में महत्वपूर्ण होगा.

सॉफ्ट टिश्यू इंजरी बनी समस्या
रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच कुल 68 क्रिकेटर्स की चोटों का इलाज और प्रबंधन बीसीसीआई-सीईओ की स्पोर्ट्स साइंस मेडिसिन (SSM) टीम ने किया. इनमें महिला क्रिकेटर्स भी शामिल हैं. हालांकि, रिपोर्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के रिहैबिलिटेशन की संख्या या अवधि का अलग-अलग विवरण नहीं दिया गया है. इन मामलों में सॉफ्ट टिश्यू इंजरी सबसे प्रमुख रही. इस श्रेणी में मांसपेशियों और उनसे जुड़े ऊतकों की चोटें आती हैं, जो खिलाड़ियों की दौड़ने, गेंदबाजी करने और मैदान पर तेजी से मूवमेंट करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं.
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रिपोर्ट में इम्पैक्ट इंजरी के उदाहरण के तौर पर ऋषभ पंत का उल्लेख किया गया है. जुलाई 2025 में मैनचेस्टर टेस्ट के दौरान पैर में फ्रैक्चर होने के बाद ऋषभ को उपचार की जरूरत पड़ी थी. रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि रोहित शर्मा ने भी इस अवधि में सीओई में रिहैबिलिटेशन कराया था. बीसीसीआई ने उस समय उनके सेंटर में उपचार को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया था. रिपोर्ट के अनुसार, रोहित ने आईपीएल 2026 के बाद हैमस्ट्रिंग की चोट के कारण सीओई में रिपोर्ट किया था.
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चोटों से प्रभावित खिलाड़ियों की सूची में कई प्रमुख नाम शामिल हैं. जसप्रीत बुमराह, वॉशिंगटन सुंदर, नीतीश कुमार रेड्डी, हर्षित राणा, हार्दिक पंड्या और प्रसिद्ध कृष्णा ऐसे खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिनके चोट संबंधी मामले बार-बार सामने आए. रिपोर्ट में बताया गया है कि हर्षित राणा, हार्दिक पंड्या और नीतीश कुमार रेड्डी ने पिछले 18 महीनों में कम से कम चार-चार महीने सीओई में बिताए हैं. इसके अलावा 30 सितंबर 2026 तक की सूची में विराट कोहली, वरुण चक्रवर्ती, प्रिंस यादव और हर्ष दुबे सहित कई अन्य खिलाड़ियों को भी शामिल किया गया था.

सोओई में SSM प्रमुख का पद खाली
प्रमुख खिलाड़ियों की अनुपलब्धता का सीधा असर टीम सेलेक्शन और कॉम्बिनेशन पर पड़ता है. तेज गेंदबाजों के मामले में यह चुनौती और अहम हो जाती है क्योंकि लगातार मैच खेलने और अभ्यास के बीच उनके वर्कलोड को संतुलित करना जरूरी होता है. रिपोर्ट में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के प्रशासनिक और तकनीकी कामकाज से जुड़ी समस्याओं की ओर भी ध्यान दिलाया गया है. स्पोर्ट्स साइंस मेडिसिन प्रमुख नितिन पटेल ने मार्च 2025 में इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद यह पद लंबे समय तक खाली रहा. बीसीसीआई ने पिछले महीने इस पद के लिए भर्ती का विज्ञापन जारी किया. भारतीय टीम की एसएसएम इकाई और सीओई की एसएसएम टीम के बीच संवाद में भी कमी रही है. सीओई प्रमुख वीवीएस लक्ष्मण दोनों के बीच संपर्क का मुख्य माध्यम बने हुए हैं.

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारतीय टीम के स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच एड्रियन ले रॉक्सएड ने जून 2025 में खिलाड़ियों के वर्कलोड मैनेजमेंट की प्रक्रिया में कुछ बदलाव सुझाए थे, लेकिन सीओई अपनी मौजूदा व्यवस्था से अलग हटने को लेकर अनिच्छुक रहा. इस स्थिति में दोनों इकाइयों के बीच बेहतर तालमेल खिलाड़ियों की फिटनेस संबंधी रणनीति को प्रभावी बनाने के लिए अहम हो सकता है.

कोविड के दौरान भी बने थे ऐसे हालात
भारतीय क्रिकेट में सॉफ्ट टिश्यू इंजरी का दौर पहले भी देखने को मिला है. रिपोर्ट के मुताबिक, 2021-22 में कोविड-19 महामारी के दौरान बायो-बबल से बाहर निकलने के बाद कई खिलाड़ियों को चोटों का सामना करना पड़ा था. उस समय दो से तीन महीने में स्थिति पर नियंत्रण पा लिया गया था. इससे पहले 2017 में भी लगभग तीन महीने तक कई खिलाड़ी चोटिल हुए थे. उस दौर में स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच शंकर बसु ने फिटनेस कार्यक्रम में बड़े बदलाव किए थे.

सीओई की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले ऑडिट किए गए वित्त वर्ष में बजट में शामिल 57 कैम्प और टूर्नामेंट में से 15 आयोजित नहीं किए गए. इसी अवधि में सेंटर ने अलग-अलग आयु वर्ग और महिला-पुरुष खिलाड़ि 25 हाई-परफॉर्मेंस कैम्प आयोजित किए. पूर्वोत्तर राज्यों के खिलाड़ियों के लिए विशेष कैम्प भी लगाए गए. इसके अलावा स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच, अन्य कोच और मैच अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए. रिपोर्ट में उन 15 कैम्प और टूर्नामेंट के आयोजित नहीं होने के कारणों का विस्तृत उल्लेख नहीं है.

बीसीसीआई ने सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट में बंधे खिलाड़ियों और इंडिया-ए या टारगेटेड कैटेगरी के क्रिकेटरों के लिए ट्रेनिंग ब्लॉक कार्यक्रम भी शुरू किया है. इसका उद्देश्य खिलाड़ियों की ताकत और क्रिकेटिंग स्किल को बेहतर बनाने के लिए व्यवस्थित प्रशिक्षण उपलब्ध कराना है. रिपोर्ट के अनुसार, 37 खिलाड़ियों ने इस कार्यक्रम का लाभ उठाया. इनमें 11 सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट वाले और 26 इंडिया-ए या टारगेटेड कैटेगरी के खिलाड़ी शामिल थे.

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