जोधपुर |
राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग (NCISM) ने देशभर के स्नातकोत्तर (पीजी) आयुर्वेद मेडिकल कॉलेजों में विभागाध्यक्ष (HOD) नियुक्ति प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। नए निर्देशों के अनुसार अब विभागाध्यक्ष का पद स्थायी न होकर हर तीन वर्ष में रोटेशन के आधार पर बदला जाएगा।
आयोग द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि जिन विभागों में एक से अधिक प्रोफेसर कार्यरत हैं, वहां सभी योग्य प्रोफेसरों को क्रमवार तीन-तीन वर्ष के लिए विभागाध्यक्ष बनने का अवसर दिया जाएगा। इस व्यवस्था को सभी आयुर्वेद संस्थानों, विश्वविद्यालयों एवं मेडिकल कॉलेजों में अनिवार्य रूप से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।
NCISM ने स्पष्ट किया है कि यह प्रावधान राष्ट्रीय आयोग के 2024 विनियमों के अनुरूप लागू किया गया है। आयोग ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो इसे विनियमों का उल्लंघन माना जाएगा और NCISM अधिनियम-2020 के तहत संबंधित संस्थान के विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है।
इस निर्णय से देशभर के 150 से अधिक पीजी आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज प्रभावित होंगे। आयुष मेडिकल एसोसिएशन के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. राकेश पांडेय के अनुसार, अब तक कई संस्थानों में वरिष्ठ प्रोफेसर लंबे समय तक विभागाध्यक्ष बने रहते थे, जिससे अन्य योग्य प्रोफेसरों को प्रशासनिक नेतृत्व का अवसर नहीं मिल पाता था।
नई व्यवस्था से न केवल सभी प्रोफेसरों को समान अवसर मिलेगा, बल्कि प्रशासनिक एवं शैक्षणिक नेतृत्व क्षमता विकसित करने में भी सहायता मिलेगी। इससे भविष्य में उच्च प्रशासनिक पदों के लिए योग्य शिक्षकों की संख्या बढ़ने की उम्मीद है।
मुख्य बिंदु:
- विभागाध्यक्ष पद पर हर 3 वर्ष में रोटेशन अनिवार्य।
- एक से अधिक प्रोफेसर होने पर सभी को बारी-बारी से अवसर।
- NCISM के 2024 विनियमों के तहत लागू व्यवस्था।
- नियमों का पालन न करने पर कार्रवाई संभव।
- जूनियर एवं अन्य योग्य प्रोफेसरों को भी नेतृत्व का अवसर मिलेगा।








