भोपाल
नवरात्रि के पावन पर्व पर मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना से पूरा प्रदेश भक्ति रस में डूबा हुआ है। इसी आस्था और भक्ति के प्रवाह में उमरिया जिले के बिरसिंहपुर पाली में प्रतिष्ठित स्थित मां बिरासिनी देवी का प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। करीब दसवीं शताब्दी से जुड़ी मानी जाने वाली इस धरोहर में विराजित मां बिरासिनी को मां काली और आदिशक्ति के स्वरूप में पूजा जाता है। प्राचीन प्रतिमा, उससे जुड़ी लोककथाएं और पीढ़ियों से चली आ रही पूजा परंपराएं इस धाम को विशिष्ट पहचान देती हैं।
स्वप्न में मिले संकेत, खेत में मिली प्रतिमा
मां बिरासिनी मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक प्रचलित लोककथा के अनुसार, सैकड़ों वर्ष पहले पाली निवासी धौकल को स्वप्न में माता ने दर्शन दिए थे। मान्यता है कि माता ने उन्हें एक खेत में अपनी प्रतिमा होने का संकेत दिया और उसे निकालकर उचित स्थान पर स्थापित करने को कहा। इसके बाद खुदाई में प्रतिमा मिलने की बात कही जाती है। धौकल ने प्रतिमा को एक छोटी-सी मढ़िया में स्थापित कर पूजा-अर्चना शुरू की। समय के साथ माता के प्रति लोगों की आस्था बढ़ती गई और स्थानीय मान्यता के अनुसार, नगर के राजा बीरसिंह ने यहां मंदिर का निर्माण कराया। इस तरह एक छोटे पूजा स्थल ने कालांतर में क्षेत्र के प्रमुख देवी धाम का स्वरूप ले लिया।
कल्चुरी कालीन प्रतिमा है विशेष पहचान
मंदिर में विराजित मां बिरासिनी की प्रतिमा काले पत्थर से निर्मित है। इतिहासकारों और स्थानीय जानकारों के अनुसार, इसे कल्चुरी काल की प्रतिमा माना जाता है, जिसका समय लगभग दसवीं शताब्दी बताया जाता है। मां काली के स्वरूप में होने के बावजूद प्रतिमा का मुख बंद है और माता की जीभ बाहर निकली हुई नहीं है। उनका सौम्य भाव इस प्रतिमा को विशिष्ट बनाता है।
मंदिर के गर्भगृह में माता के समीप भगवान हरिहर की प्रतिमा भी विराजमान है। भगवान हरिहर को भगवान शिव और भगवान विष्णु के संयुक्त स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं के पूजा स्थल भी हैं, जो इस धाम की धार्मिक महत्ता को और बढ़ाते हैं।
वर्ष 1989 में शुरू हुआ जीर्णोद्धार
समय के साथ प्राचीन मंदिर को भव्य स्वरूप प्रदान करने के उद्देश्य से इसके जीर्णोद्धार का कार्य शुरू किया गया। जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के मार्गदर्शन और सान्निध्य में 23 नवंबर 1989 को जीर्णोद्धार कार्य का शुभारंभ हुआ। स्थानीय नागरिकों, कोयला क्षेत्र के प्रबंधन और दानदाताओं के सहयोग से लगभग 27 लाख रुपये की लागत से मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया। मंदिर का वास्तुचित्र वास्तुकार विनायक हरिदास, एनबीसीसी नई दिल्ली द्वारा उपलब्ध कराया गया था।
इसके बाद जगद्गुरु शंकराचार्य पुरी पीठ के स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के सान्निध्य में 22 अप्रैल 1999 को मंदिर के लोकार्पण और प्रतिष्ठा संबंधी कार्यक्रम संपन्न होने का उल्लेख मिलता है। जीर्णोद्धार के बाद मंदिर ने भव्य स्वरूप प्राप्त किया, लेकिन इसकी प्राचीन आस्था और परंपराएं आज भी इसकी मूल पहचान बनी हुई हैं।
नवरात्र में ज्योति कलश, जवारा और अठवाईं की परंपरा
मां बिरासिनी मंदिर में चैत्र और शारदीय नवरात्र का विशेष महत्व है। दोनों नवरात्र में बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना, आरती और विशेष श्रृंगार के साथ ज्योति कलश तथा जवारा कलश की स्थापना की जाती है। महाष्टमी पर अठवाईं अर्पित करने की परंपरा भी प्रचलित है।
श्रद्धालु माता के चरणों में पूजा सामग्री अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना करते हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर माता के जयकारों और भक्ति भाव से गूंज उठता है। दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले भक्त भी माता के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं।
आस्था और विरासत का संगम है मां बिरासिनी धाम
बिरसिंहपुर पाली का मां बिरासिनी मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि उमरिया जिले की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। प्राचीन प्रतिमा, उससे जुड़ी लोककथा, मंदिर के जीर्णोद्धार का इतिहास और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक परंपराएं इस धाम की विशिष्ट पहचान हैं। नवरात्रि के अवसर पर यहां उमड़ने वाली श्रद्धा इस बात का प्रतीक है कि समय के साथ मंदिर का स्वरूप भले ही बदलता रहा हो, लेकिन माता के प्रति लोगों की आस्था आज भी अटूट है।







