फरीदाबाद
अनेकों किसान आज भी अपनी परंपरागत खेती इसीलिए नहीं छोड़ पा रहे, शायद उनमें कुछ नया करने का जुनून-जज्बा नहीं है। फरीदाबाद की नीमका जेल में तैनात एक हवलदार ने अपने जुनून औ जिद से परंपरागत खेती छोड़कर जिले में एक मिसाल कायम की है।
जी हां, जिस खेत में कभी गेहूं की बालियां लहलहाती थीं, कभी चावल, ज्वार, मक्का और गन्ना बोया जाता था, वह खेत ड्रैगन फ्रूट की सुगंध से महक रहा है। परंपरागत खेती से यह किसान परिवार बड़ी मशक्कत के बाद हर साल डेढ़-दो लाख रुपये कमाता था, लेकिन नई खेती ने परिवार की जिंदगी संवार दी है।
लागत 6.5 लाख और हर साल 14 लाख का मुनाफा
किसान परिवार ने छह बीघे (एक एकड़ से ज्यादा) खेत से इस साल 14 लाख रुपये की कमाई की है। तीन साल पहले फरीदाबाद-पलवल में यह पहल करने वाले वे पहले किसान थे, लेकिन अब दोनों जिलों में तीन-चार अन्य किसान ड्रैगन फ्रूट की खेती कर रहे हैं।एक किसान के बदलने और इस जिद-जुनून की कहानी जनवरी 2023 में शुरू हुई थी।
फरीदाबाद-पलवल की सीमा पर मौजूद जल्हाका गांव के साधारण किसान नरेंद्र अत्री जिला कारागार विभाग में बतौर हवलदार नीमका जेल में तैनात है। एक रोज ड्यूटी के बाद बैरक में पलंग पर लेटे वे खेती-बाड़ी संबंधी यू ट्यूब चेनल पर ड्रैगन फ्रूट की खेती के बारे में सुन-देख रहे थे।
उसी रोज, उन्होंने अपने खेत से परंपरागत खेती को हटाने का मन बना लिया। छुट्टी वाले दिन घर पहुंचे तो पत्नी-बच्चों से कहा, अब मैं ड्रैगन फ्रूट की खेती करूंगा। बच्चों ने दो-तीन बार मना किया, मनोबल गिराया, लेकिन मूलत: किसान होने के कारण नरेंद्र का फैसला अटल था।
यूट्यूब देखकर बदली किस्मत
यूट्यूब पर जो वीडियो देखा था, वह उन्होंने सहेज रखा था। हर रोज उसे कई बार देखते थे। उससे जो सीखा, उसके अनुरूप फरवरी, 2023 में उन्होंने खेत की मिट्टी और ट्यूबवेल के पानी का पीएच लेवल चेक कराया, जो अनुकूल निकला। अगला कदम था, खेत में पोल्स खड़े करना, कलम लाना और उसे लगाना, उसके बाद रिंग लाकर पोल्स पर लगाना। ये सब काम अगले तीन महीने में पूरे हो गए।
इंतजार शुरू हुआ, कलम से पौधे के विकास और उसकी हाइट का रिंग तक पहुंचना। नौ महीने बाद वह दिन भी आया। पौधे विकसित होते हुए रिंग के अंदर जाकर पेड़ बनकर फैलने लगे। उसी समय पहली बार इनपर फ्रूट आया, किंतु नियमानुसार 15-20 साल तक फसल लेने लेने के लिए उन्हें उसी समय तोड़ना था।
सभी पेड़ों से पहली बार आया फूलनुमा फ्रूट तोड़ दिया गया। डेढ़ साल बाद पहली बार भरकर फ्रूट हुआ, जो करीब ढाई से तीन टन था। तीन साल बाद अब इस डेढ़ बीघे खेत से करीब आठ टन फ्रूट निकाला जा चुका है।
थोक मूल्य 200 रुपये किलो के हिसाब से इस साल नरेंद्र अत्री ने 14 लाख रुपये की कमाई की है। नरेंद्र बताते हैं कि पहले दिन से लेकर अब तक उनका महज 6.5 लाख रुपये खर्च हुआ है। यह खेती 10 से 12 साल तक इतना फ्रूट हर साल देगी। लागत शून्य है, कीमत हर साल बढ़ेगी तो मुनाफा भी हर साल बढ़ेगा।








