निकारागुआ में अब नहीं होंगे चुनाव? राष्ट्रपति ओर्टेगा के फैसले से दुनिया में मचा बवाल

SHARE:

मानागुआ

करीब दो दशक से सत्ता में काबिज निकारागुआ के राष्ट्रपति डेनियल ओर्टेगा ने एलान किया है कि देश में अब चुनाव नहीं होंगे. इस फैसले ने लोकतंत्र, मानवाधिकार और सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर दुनिया भर में बहस छेड़ दी है. संयुक्त राष्ट्र संघ, अमेरिका और मानवाधिकार संगठनों ने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर बड़ा हमला बताया है. आखिर ओर्टेगा ने ऐसा क्यों कहा, निकारागुआ में क्या हो रहा है और इसका असर क्या होगा? आइए समझते हैं। 

निकारागुआ में क्या हुआ?
मध्य अमेरिकी देश निकारागुआ के राष्ट्रपति डेनियल ओर्टेगा ने साफ शब्दों में कहा कि अब उनके देश में चुनाव नहीं कराए जाएंगे. उन्होंने कहा कि अमेरिका समर्थित दलों को दोबारा सत्ता में आने का मौका नहीं दिया जाएगा. इस बयान के साथ ही नवंबर 2027 में प्रस्तावित अगले राष्ट्रपति चुनाव पर लगभग विराम लग गया। 

कौन हैं डेनियल ओर्टेगा?
डेनियल ओर्टेगा निकारागुआ की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा रहे हैं. पहली बार 1979 की सैंडिनिस्टा क्रांति के बाद सत्ता में आए. 1985 से 1990 तक राष्ट्रपति रहे. 2007 में दोबारा सत्ता में लौटे और तब से लगातार राष्ट्रपति बने हुए हैं. साल 2025 में उन्होंने संविधान में बदलाव कर अपनी पत्नी रोसारियो मुरिलो को संयुक्त राष्ट्रपति बना दिया. आज सरकार, संसद, न्यायपालिका, सेना और प्रशासन सभी पर उनके परिवार को मजबूत नियंत्रण माना जाता है। 

आखिर चुनाव खत्म करने की जरूरत क्यों पड़ी?
ओर्टेगा का कहना है कि चुनाव का इस्तेमाल अमेरिका समर्थित ताकतें सरकार बदलने के लिए करती रही हैं. उनका दावा है कि विदेशी दखल रोकने और देश की क्रांति को बचाने के लिए यह कदम जरूरी है. लेकिन विपक्ष और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का कहना है कि असली वजह यह है कि ओर्टेगा सत्ता में हमेशा बने रहना चाहते हैं। 

क्या निकारागुआ पहले भी लोकतांत्रिक चुनाव कराता था?
तकनीकी रूप से कहा जा सकता है कि हां निकारागुआ में अब तक लोकतांत्रिक चुनाव हुआ करते थे लेकिन बीते कई वर्षों से नतीजों की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहे हैं। 

चुनावों को लेकर सबसे बड़ा विवाद 2021 में हुआ था, तब मतदान से पहले कई विपक्षी नेताओं और राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवारों को गिरफ्तार कर लिया गया था। 

इसके बाद ओर्टेगा ने चुनाव जीता, लेकिन अमेरिका, यूरोपीय देशों और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इस चुनाव को स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं माना। 

ओर्टेगा ने 2021 के चुनाव में खुद को विजेता घोषित किया जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने बड़े पैमाने पर अवैध माना. ओर्टेगा ने तब उन सभी उम्मीदवारों को जेल में डाल दिया था जो उन्हें हरा सकते थे. अमेरिका आज ओर्टेगा के राष्ट्रपति पद को मान्यता नहीं देता है। 

पूर्व चुनाव प्रत्याशी ने क्या कहा? 
2021 के चुनाव में प्रत्याशी रहे सेबेस्टियन चमोरा कहते हैं कि चुनाव न कराने की ताजा घोषणा ओर्टेगा की उस लंबे समय से चली आ रही योजना को उजागर करती है जिसके तहत वे चीन और क्यूबा जैसे एक-दलीय शासन वाले देशों की तरह सैंडिनिस्टा पार्टी के हाथों में सत्ता केंद्रित करना चाहते हैं. चमोरा 200 से अधिक अन्य राजनीतिक कैदियों के साथ 2023 में अमेरिका भेजे जाने तक जेल में थे। 

2018 के प्रदर्शन क्यों अहम हैं?
2021 से पहले 2018 में निकारागुआ में सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे. सरकारी कार्रवाई में 300 से ज्यादा लोगों की मौत हुई. इसके बाद सरकार ने विपक्ष, पत्रकारों, चर्च, सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर सख्त कार्रवाई शुरू कर दी. हजारों लोग देश छोड़कर भाग गए और हजारों संगठनों का पंजीकरण रद्द कर दिया गया। 

अभी देश में क्या स्थिति है?
मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, कम से कम 46 राजनीतिक कैदी अभी भी जेल में हैं. 5,000 से ज्यादा गैर-सरकारी संगठनों को बंद किया जा चुका है. कई पत्रकार और विपक्षी नेता निर्वासन में रह रहे हैं. हाल ही में बड़ी संख्या में वकीलों के लाइसेंस भी रद्द कर दिए गए. हालांकि, सरकार इन सभी आरोपों से इनकार करती रही है। 

संयुक्त राष्ट्र ने क्या कहा?
संयुक्त राष्ट्र संघ ने निकारागुआ के राष्ट्रपति डेनियल ऑर्टेगा के भविष्य में चुनाव न कराने की घोषणा पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। 

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर टुर्क ने कहा, "हर नागरिक को चुनाव लड़ने और वोट देने का अधिकार होना चाहिए. निकारागुआ में राजनीतिक और नागरिक अधिकार लगातार कमजोर हो रहे हैं. सरकार को राजनीतिक कैदियों को रिहा करना चाहिए। 

यूएन का यह भी कहना है कि निकारागुआ में अभिव्यक्ति की आजादी की गुंजाइश लगभग खत्म हो चुकी है। 

अमेरिका की प्रतिक्रिया क्या रही?
अमेरिका पहले से ही ओर्टेगा को बतौर राष्ट्रपति मान्यता नहीं देता है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो उनके इस घोषणा पर निकारागुआ पर दबाव बढ़ाने की बात कही है। 

अमेरिकी विदेश मंत्री रुबियो ने कहा, "ओर्टेगा सरकार ने लोकतंत्र का दिखावा भी छोड़ दिया है. दुनिया को निकारागुआ को सामान्य लोकतांत्रिक देश की तरह नहीं देखना चाहिए. दूसरे देशों को भी निकारागुआ पर दबाव बढ़ाना चाहिए। 

विपक्ष क्यों चिंतित है?
विपक्षी नेताओं का कहना है कि चुनाव खत्म होने का मतलब है कि अब सत्ता बदलने का संवैधानिक रास्ता लगभग बंद हो गया है. उनका आरोप है कि सरकार निकारागुआ को चीन और क्यूबा जैसी एक-दलीय राजनीतिक व्यवस्था की ओर ले जा रही है। 

क्या निकारागुआ में सचमुच चुनाव नहीं होंगे?
फिलहाल राष्ट्रपति ओर्टेगा ने सार्वजनिक रूप से यही घोषणा की है. हालांकि इस फैसले को लागू करने के लिए कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया क्या होगी, इसकी पूरी जानकारी अभी सामने नहीं आई है. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार के पास संसद और सरकारी संस्थानों पर पूरा नियंत्रण होने के कारण इस फैसले को लागू करना उसके लिए मुश्किल नहीं होगा। 

दुनिया को इसकी चिंता क्यों करनी चाहिए?
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव सत्ता परिवर्तन का सबसे शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीका होते हैं. अगर चुनाव ही खत्म कर दिए जाएं तो जनता के पास सरकार बदलने का लोकतांत्रिक अधिकार खत्म हो जाता है. सत्ता एक ही व्यक्ति या दल के हाथों में लंबे समय तक रहने से मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर और दबाव बढ़ सकता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश की लोकतांत्रिक साख कमजोर हो सकती है। 

फिलहाल ऐसे कोई संकेत नहीं हैं कि ओर्टेगा सरकार अपने फैसले से पीछे हटेगी। 

अब दुनिया की नजर इस बात पर रहेगी कि क्या निकारागुआ औपचारिक रूप से चुनावी व्यवस्था खत्म करता है, अंतरराष्ट्रीय दबाव कितना बढ़ता है और विपक्ष के लिए लोकतांत्रिक राजनीति की कितनी गुंजाइश बचती है। 

1
Default choosing

Did you like our plugin?

सबसे ज्यादा पढ़ी गई

Horoscope

Weather

और पढ़ें

राज्य

शहर चुनें